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विशेष आलेख

पेड न्यूज़ और निर्भीक पत्रकारिता का दौर

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डॉ॰ राम प्रवेश राय। हर वर्ष 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। इस संदर्भ मे आयोजित अनेक गोष्ठियों और विचार विमर्श में पत्रकारिता के गिरते मूल्यों पर घोर चिंता भी व्यक्त की जाती है। पिछले वर्ष भी अनेक स्थानो पर गोष्ठियाँ आयोजित की गई ...

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संसद में ख़बरें कैसे घूमती हैं?

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ओम प्रकाश दास… साठवें दशक में टाईम्स आफ इंडिया समूह के हिन्दी अखबार नवभारत टाईम्स के लिए एक अलग ब्यूरो का गठन किया गया। ब्यूरो बनाने के पीछे टाईम्स ग्रुप के अध्यॿ शाहू शांतिलाल जैन का तर्क था कि संसद और विभिन्न मंत्रालयों की अलग से और विशिष्ट रिपोर्टिंग के लिए ब्यूरो ...

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चुनाव-सर्वेक्षणों की होड़ में पिचकती पत्रकारिता

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उर्मिलेश | राजनीतिक दलों या नेताओं के जीतने-हारने या उनकी सीटों के पूर्वानुमान लगाने वाले ओपिनियन-पोल राजनीति और राजनेताओं के लिए कितने फायदेमंद या नुकसानदेह हैं, इस पर विवाद हो सकता है। लेकिन एक पत्रकार के रूप में मैं अपने अनुभव की रोशनी में बेहिचक कह सकता हूं कि चुनाव-अधिसूचना ...

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पत्रकारों का भविष्य और भविष्य की पत्रकारिता

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दिलीप मंडल।… सूचनाओं और समाचार का प्राथमिक स्रोत सोशल मीडिया बनता जा रहा है। फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन जैसे माध्यम अब बड़ी संख्या में लोगों के लिए वह जरिया बन चुके हैं, जहां उन्हें देश, दुनिया या पड़ोस में होने वाली हलचल की पहली जानकारी मिलती है। ऐसे लोग कई बार ...

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भविष्य का मीडिया: क्या हम तैयार हैं?

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प्रभु झिंगरन | हिन्दुस्तान में आने वाले दिनों में मीडिया के स्वरूप और भविष्य को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों के अनुभव बताते हैं मीडिया का भविष्य और स्वरूप तेजी से बदलने का ये सिलसिला आने वाले सालों में भी जारी रहेगा। मीडिया उद्योग ...

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अखबारों के अंदाज़ निराले!

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प्रो. डॉ.सचिन बत्रा | आज दुनियां भर में लाखों की संख्या में समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। उनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जिनके अलग अंदाज ने पाठकों का मन ही मोह लिया हैऔर अपनी विशिष्ठता के दम पर अपना एक अलग स्थान बनाया है। डेली लिबरेशन फ्रांस की ...

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क्या आप जानते हैं ड्रोन 16वीं शताब्दी से हमारे बीच मौजूद हैं?

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ड्रोन एक ऐसा यांत्रिक पक्षी है जो पॉयलट के इशारे पर आसमान में उड़ाया जाता है और उसकी मशीनी आंखों को आसमान में तैनात कर एरियल यानि ऊंचाई से वांछित दृश्यों व तसवीरों को रिकार्ड किया जा सकता है. दिलचस्प बात यह है कि बचपन के दौर में हम सेना ...

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कूप-जल नहीं, भाखा बहता नीर

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अकबर रिज़वी | भाषा सिर्फ हिन्दी, अँग्रेज़ी, उर्दू आदि ही नहीं होती, बल्कि हाव-भाव भी एक भाषा ही है। भाषा का कोई स्थाई मानक नहीं होता। ख़ास-तौर से जनभाषा न तो विशुद्ध साहित्यिक हो सकती है और न ही व्याकरण के कठोर नियमों से बांधी जा सकती है। जन-साधारण में ...

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हिंदी सिनेमा की कामकाजी एवं सशक्त महिलाएं

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निभा सिन्हा | आधी आबादी के सशक्तिकरण के बगैर समाज और देश के विकास की कोरी कल्पना ही की जा सकती है। महिलाओं  का सशक्तिकरण लंबे समय से चिंता का विषय रहा है और यह आज भी समय की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत बनी हुई है। जनमाध्यमों  के व्यापक पहुंच एवं प्रभाव को ...

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भोजपुरी सिनेमा: पतन तो होना ही था

Padma Khanna

प्रभु झिंगरन | बनारस का अप्रतिम सौन्दर्य, गंगा-घाट देशी विदेशीे फिल्मकारों के लिए सदैव आकर्षण का केन्द्र रहा है। फोटोग्राफी की बात करें तो शायद बनारस दुनिया के 2-4 ऐसे शहरों में से एक है जिस शहर और उसकी दिनचर्या पर सबसे अधिक काफीटेबल पुस्तकें/एलबम दुनिया भर में प्रकाशित हो ...

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संचार क्रांति के बाद मीडिया: नज़रिए की बात है…

Photo Courtesy - oocities.org

अकबर रिज़वी | सैद्धांतिक स्तर पर हम भी यही मानते हैं कि अनुवाद एक कला है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर इससे काम नहीं चलने वाला। व्यवहार में तो अनुवाद को शिल्प की ही तरह लिया जा सकता है। ऐसा काम से बचने या भाषा-ज्ञान के अभाव के कारण नहीं है। ...

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महिलाओं के संदर्भ में नई मीडिया एवं सामाजिक परिवर्तन

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निभा सिन्हा | महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार को लेकर लंबे समय से वैश्विक स्तर पर चिंता व्यक्त की जा रही है और समय समय पर इसके लिए कदम भी उठाए गए हैं। देश में आजादी के बाद से नीति निर्माताओं ने मुख्यघारा की मीडिया, रेडियो, टेलीविजन, और समाचार पत्रों से  महिलाओं ...

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