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विशेष आलेख

ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म की ओर

close up of conference meeting microphones and businessman

मनोज कुमार | ‘ठोंक दो’ पत्रकारिता का ध्येय वाक्य रहा है और आज मीडिया के दौर में ‘काम लगा दो’ ध्येय वाक्य बन चुका है। ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म का यह बदला हुआ स्वरूप हम देख रहे हैं। कदाचित पत्रकारिता से परे हटकर हम प्रोफेशन की तरफ आगे बढ़ ...

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वर्किंग जर्नलिस्टर ऐक्ट  के दायरे में  कब आयेंगे टीवी पत्रकार ?

journalist

उदय चंद्र सिंह | देश में उदारीकरण का दौर शुरु होने के साथ हीं  तमाम उद्योग धंधों की तरह खबरों का बाजार भी खूब चमका । टेलीविजन न्यूज चैनलों की तो जैसे बाढ़ सी आ गई है ।  हर कोई यही कहता फिर रहा है कि टीवी मीडिया बहुत ‘ताकतवर’ ...

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विज्ञापन अब मांग पैदा करते हैं

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प्रो.डॉ.सचिन बत्रा | अब तक यह माना जाता था कि विज्ञापन किसी उत्पाद या सेवा की जानकारी देने सहित प्रचार के लिए बनाए जाते हैं। लेकिन आज के दौर में विज्ञापन का निर्माण और चयन मांग पैदा करने के पैमाने पर किया जाता है। इसमें तरह—तरह की युक्तियां प्रचलित हैं। जैसे ...

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मीडिया और लोकतंत्र : एक दूसरे से पूरक या विरोधी

democracy

राजेश कुमार।  यह शोध पत्र मुख्य रूप से वैश्विक स्तर पर मीडिया और विभिन्न देशों की राजनीतिक‚ सामाजिक‚ आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था के साथ उसके अंतरसंबंधों पर प्रकाश डालता है। विभिन्न समयकाल में विकसित होने वाली राजनीतिक व्यवस्थाओं ने मीडिया को किस हद तक प्रभावित किया? इन परिस्थितियों में मीडिया ...

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पेड न्यूज़ और निर्भीक पत्रकारिता का दौर

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डॉ॰ राम प्रवेश राय। हर वर्ष 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। इस संदर्भ मे आयोजित अनेक गोष्ठियों और विचार विमर्श में पत्रकारिता के गिरते मूल्यों पर घोर चिंता भी व्यक्त की जाती है। पिछले वर्ष भी अनेक स्थानो पर गोष्ठियाँ आयोजित की गई ...

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संसद में ख़बरें कैसे घूमती हैं?

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ओम प्रकाश दास… साठवें दशक में टाईम्स आफ इंडिया समूह के हिन्दी अखबार नवभारत टाईम्स के लिए एक अलग ब्यूरो का गठन किया गया। ब्यूरो बनाने के पीछे टाईम्स ग्रुप के अध्यॿ शाहू शांतिलाल जैन का तर्क था कि संसद और विभिन्न मंत्रालयों की अलग से और विशिष्ट रिपोर्टिंग के लिए ब्यूरो ...

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चुनाव-सर्वेक्षणों की होड़ में पिचकती पत्रकारिता

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उर्मिलेश | राजनीतिक दलों या नेताओं के जीतने-हारने या उनकी सीटों के पूर्वानुमान लगाने वाले ओपिनियन-पोल राजनीति और राजनेताओं के लिए कितने फायदेमंद या नुकसानदेह हैं, इस पर विवाद हो सकता है। लेकिन एक पत्रकार के रूप में मैं अपने अनुभव की रोशनी में बेहिचक कह सकता हूं कि चुनाव-अधिसूचना ...

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पत्रकारों का भविष्य और भविष्य की पत्रकारिता

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दिलीप मंडल।… सूचनाओं और समाचार का प्राथमिक स्रोत सोशल मीडिया बनता जा रहा है। फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन जैसे माध्यम अब बड़ी संख्या में लोगों के लिए वह जरिया बन चुके हैं, जहां उन्हें देश, दुनिया या पड़ोस में होने वाली हलचल की पहली जानकारी मिलती है। ऐसे लोग कई बार ...

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भविष्य का मीडिया: क्या हम तैयार हैं?

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प्रभु झिंगरन | हिन्दुस्तान में आने वाले दिनों में मीडिया के स्वरूप और भविष्य को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों के अनुभव बताते हैं मीडिया का भविष्य और स्वरूप तेजी से बदलने का ये सिलसिला आने वाले सालों में भी जारी रहेगा। मीडिया उद्योग ...

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अखबारों के अंदाज़ निराले!

liberation

प्रो. डॉ.सचिन बत्रा | आज दुनियां भर में लाखों की संख्या में समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। उनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जिनके अलग अंदाज ने पाठकों का मन ही मोह लिया हैऔर अपनी विशिष्ठता के दम पर अपना एक अलग स्थान बनाया है। डेली लिबरेशन फ्रांस की ...

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क्या आप जानते हैं ड्रोन 16वीं शताब्दी से हमारे बीच मौजूद हैं?

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ड्रोन एक ऐसा यांत्रिक पक्षी है जो पॉयलट के इशारे पर आसमान में उड़ाया जाता है और उसकी मशीनी आंखों को आसमान में तैनात कर एरियल यानि ऊंचाई से वांछित दृश्यों व तसवीरों को रिकार्ड किया जा सकता है. दिलचस्प बात यह है कि बचपन के दौर में हम सेना ...

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कूप-जल नहीं, भाखा बहता नीर

language

अकबर रिज़वी | भाषा सिर्फ हिन्दी, अँग्रेज़ी, उर्दू आदि ही नहीं होती, बल्कि हाव-भाव भी एक भाषा ही है। भाषा का कोई स्थाई मानक नहीं होता। ख़ास-तौर से जनभाषा न तो विशुद्ध साहित्यिक हो सकती है और न ही व्याकरण के कठोर नियमों से बांधी जा सकती है। जन-साधारण में ...

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