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क़मर वहीद नक़वी

क़मर वहीद नक़वी
क़मर वहीद नक़वी

स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया.

कुछ नया गढ़ो, जो पहले से आसान भी हो और अच्छा भी हो— क़मर वहीद नक़वी का कुल एक लाइन का ‘फंडा’ यही है! ‘आज तक’ और ‘चौथी दुनिया’—एक टीवी में और दूसरा प्रिंट में— ‘आज तक’ की झन्नाटेदार भाषा और अक्खड़ तेवरों वाले ‘चौथी दुनिया’ में लेआउट के बोल्ड प्रयोग — दोनों जगह क़मर वहीद नक़वी की यही धुन्नक दिखी कि बस कुछ नया करना है, पहले से अच्छा और आसान. 1995 में डीडी मेट्रो पर शुरू हुए 20 मिनट के न्यूज़ बुलेटिन को ‘आज तक’ नाम तो नक़वी ने दिया ही, उसे ज़िन्दा भाषा भी दी, जिसने ख़बरों को यकायक सहज बना दिया, उन्हें समझना आसान बना दिया और ‘अपनी भाषा’ में आ रही ख़बरों से दर्शकों का ऐसा अपनापा जोड़ा कि तब से लेकर अब तक देश में हिन्दी न्यूज़ चैनलों की भाषा कमोबेश उसी ढर्रे पर चल रही है!

नक़वी ने अपने दो कार्यकाल में ‘आज तक’ के साथ साढ़े तेरह साल से कुछ ज़्यादा का वक़्त बिताया. इसमें दस साल से ज़्यादा समय तक वह ‘आज तक’ के सम्पादक रहे. पहली बार, अगस्त 1998 से अक्तूबर 2000 तक, जब वह ‘आज तक’ के ‘एक्ज़िक्यूटिव प्रोड्यूसर’ और ‘चीफ़ एक्ज़िक्यूटिव प्रोड्यूसर’ रहे. उस समय ‘आज तक’ दूरदर्शन के प्लेटफ़ार्म पर ही था और नक़वी के कार्यकाल में ही दूरदर्शन पर ‘सुबह आज तक’, ‘साप्ताहिक आज तक’, ‘गाँव आज तक’ और ‘दिल्ली आज तक’ जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत हुई. ‘आज तक’ के साथ अपना दूसरा कार्यकाल नक़वी ने फ़रवरी 2004 में ‘न्यूज़ डायरेक्टर’ के तौर पर शुरु किया और मई 2012 तक इस पद पर रहे. इस दूसरे कार्यकाल में उन्होंने ‘हेडलाइन्स टुडे’ की ज़िम्मेदारी भी सम्भाली और दो नये चैनल ‘तेज़’ और ‘दिल्ली आज तक’ भी शुरू किये. ‘टीवी टुडे मीडिया इंस्टीट्यूट’ भी शुरू किया, जिसके ज़रिये देश के दूरदराज़ के हिस्सों से भी युवा पत्रकारों को टीवी टुडे में प्रवेश का मौक़ा मिला.

नक़वी ने हिन्दी की टीवी पत्रकारिता को केवल भाषा ही नहीं दी, ‘आज तक’ के ‘दूरदर्शनी’ दिनों में उन्होंने हिन्दी के टीवी पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की. हिन्दी टीवी पत्रकारिता के मौजूदा ज़्यादातर बड़े नामों ने अपने शुरुआती दिनों में उनके साथ काम किया है. ‘टीवी टुडे मीडिया इंस्टीट्यूट’ के ज़रिये सात वर्षों में उन्होंने हिन्दी-अँगरेज़ी के सौ से ज़्यादा टीवी पत्रकारों की एक और प्रतिभाशाली पौध तैयार की. सीखते रहना और सिखाते रहना उनका सबसे प्रिय शौक़ है.

अक्तूबर 2013 में वह इंडिया टीवी के एडिटोरियल डायरेक्टर बने, लेकिन वहाँ कुछ ही समय तक रहे. फ़िलहाल कुछ और ‘नये’ आइडिया को उलट-पुलट कर देख रहे हैं कि कुछ मामला जमता है या नहीं. तब तक उनकी ‘राग देश’ वेबसाइट तो चल ही रही है!

नक़वी कहते हैं “यह Times Trainee Journalist Scheme की ही प्रेरणा है कि मुझे पत्रकारिता के छात्रों से बातें करना, और जो मैं उन्हें सिखा सकता हूँ, वह सिखा देना बहुत प्रिय है. 1995 में ‘आज तक’ के शुरुआती दिनों में मैंने पाया कि ज़्यादातर टीवी पत्रकारों को स्क्रिप्ट लिखने में बड़ी परेशानी होती है. समझ में नहीं आता कि कहाँ से शुरू करें, कहाँ पर ख़त्म! कौन-सी बाइट पहले लगायें, कौन-सी बाद में और क्यों? आज भी टीवी पत्रकारों की सबसे बड़ी समस्या यही है! क्या स्क्रिप्ट राइटिंग का कोई फ़ार्मूला है? जी हाँ, है तो. आमतौर पर टीवी पत्रकारिता के छात्रों को मैं यही पढ़ाता हूँ. क्योंकि पत्रकारिता में दो ही चीज़ें मुझे बेहतर आती हैं— कापी लिखना और ले-आउट. टीवी में तो ले-आउट की ज़रूरत नहीं, और प्रिंट में अब यह कम्प्यूटरों से होने लगा है. कापी ज़रूर अभी तक मनुष्यों के ही ज़िम्मे है!” नक़वी की पाठशाला’ कहीं भी लग सकती है, बशर्ते कि छात्र गम्भीरता से सीखना चाहें.”

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