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भाषा की बधिया वक्‍त के सामने बैठ जाती है

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कुमार मुकुल। धूमिल ने लिखा है – भाषा की बधिया वक्‍त के सामने बैठ जाती है। इधर हिन्‍दी के लेखक, कवि और पत्रकार जिस तरह भाषा को बरत रहे हैं उसे देखकर उसकी बधिया बैठती नजर आती है। अपने एक वरिष्‍ट और प्रिय कवि के यहां भी जब एक कविता ...

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भाषा की बधिया वक्‍त के सामने बैठ जाती है

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कुमार मुकुल। धूमिल ने लिखा है – भाषा की बधिया वक्‍त के सामने बैठ जाती है। इधर हिन्‍दी के लेखक, कवि और पत्रकार जिस तरह भाषा को बरत रहे हैं उसे देखकर उसकी बधिया बैठती नजर आती है। अपने एक वरिष्‍ट और प्रिय कवि के यहां भी जब एक कविता ...

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अखबार की भाषा : कैसे चुस्त बनाएं?

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कुमार मुकुल। बाजार के दबाव में आज मीडिया की भाषा किस हद तक नकली हो गयी है इसे अगर देखना हो तो हम आज केअखबार उठा कर देख सकते हैं। उदाहरण के लिए कल तक भाषा के मायने में एक मानदंड के रूप में जाने जाने वाले एक अख़बार ही ...

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