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Tag Archives: साहित्यकार

वीरेन दा का जाना : आएंगे उजले दिन, ज़रूर आएंगे…

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अतुल सिन्हा। वीरेन डंगवाल उन पत्रकारों में कभी नहीं रहे जो सत्ता और सियासत के इर्द गिर्द अपनी पत्रकारिता को किसी ख़ास ‘मकसद’ से करते हैं। आजकल तो वैसे भी संस्थागत पत्रकारिता के अपने मायने हैं। पहले भी थे, लेकिन अब विशुद्ध रूप से व्यावसायिक हितों से जुड़े हैं। पत्रकार ...

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‘साहित्य में तुम मेरी पीठ खुजाओ, मैं तुम्हारी खुजाता हूं… बेहद आम बात है

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हिंदी अपराध लेखन में शीर्ष लेखकों में शुमार सुरेंद्र मोहन पाठक का मानना है कि लोकप्रिय साहित्य का पाठक अपने लेखक की हैसियत बनाता है, खालिस साहित्यकार इस हैसियत से वंचित हैं। विकास कुमार की उनसे खास बातचीत विकास कुमार आपने एक साक्षात्कार में बताया था कि उर्दू और बंग्ला ...

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क्या पत्रकारिता साहित्य की उपेक्षा कर रही है?

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गोविंद सिंह। साहित्य और पत्रकारिता के बीच एक अटूट रिश्ता रहा है। एक ज़माना वह था जब इन दोनों को एक-दूसरे का पर्याय समझा जाता था। ज्यादातर पत्रकार साहित्यकार थे और ज्यादातर साहित्यकार पत्रकार। पत्रकारिता में प्रवेश की पहली शर्त ही यह हुआ करती थी कि उसकी देहरी में कदम ...

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