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Tag Archives: सुभाष धूलिया

समाचार लेखन : कौन, क्या, कब, कहां, क्यों और कैसे?

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सुभाष धूलिया। परंपरागत रूप से बताया जाता है कि समाचार उस समय ही पूर्ण कहा जा सकता है जब वह कौन, क्या, कब, कहां, क्यों और कैसे सभी प्रश्नों या इनके उत्तर को लेकर लोगों की जिज्ञासा को संतुष्ट करता हो। हिंदी में इन्हें छह ककार ( Five W and ...

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समाचार, सिद्धांत और अवधारणा: समाचार क्‍या है?

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सुभाष धूलिया समाचार क्‍या है? पत्रकारिता के उदभव और विकास के पूरे दौर में इस प्रश्‍न का सर्वमान्‍य उत्‍तर कभी किसी के पास नहीं रहा। आज प‍त्रकारिता और संपूर्ण और संपूर्ण मीडिया जगत की तेजी से बदलती तस्‍वीर से इस प्रश्‍न का उत्‍तर और भी जटिल होता जा रहा है। ...

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समाचार : अवधारणा और मूल्य

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सुभाष धूलिया | आधुनिक समाज में सूचना और संचार का महत्व बहुत बढ़ गया है। देश-दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसकी अधिकांश जानकारियां हमें समाचार माध्यमों से मिलती हैं। यह भी कह सकते हैं कि हमारे प्रत्यक्ष अनुभव से बाहर की दुनिया के बारे में हमे अधिकांश जानकारियां ...

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समाचार: सिद्धांत और अवधारणा – समाचार लेखन के सिद्धांत

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सुभाष धूलिया पहले हमने पांच ‘डब्‍ल्‍यू’ और एक ‘एच’ यानी छह ककारों की चर्चा की है। दरअसल, समाचार लेखन में घटनाओं और इनसे संबंधित तथ्‍यों के चयन की प्रक्रिया का महत्‍वपूर्ण स्‍थान होता है। देश-दुनिया में रोज हजरों-लाखों घटनाएं घटती हैं लेकिन इनमें से कुछ ही समाचार बन पाती हैं। ...

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समकालीन वैश्विक मीडिया: राजनीतिक, सामाजिक और संस्कृतिक जीवन का मनोरंजनीकरण

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सुभाष धूलिया मीडिया उद्योग एक तरह के सांस्कृतिक और वैचारिक उद्योग हैं। इन उद्योगों पर नियंत्रण का अर्थ होता है किसी देश की राजनीति और संस्कृति पर नियंत्रण. दुनिया के अनेक देशों में अमेरिकी सांस्कृतिक आक्रमण को लेकर असंतोष पनप रहा है जिनमें केवल विकासशील देश ही नहीं  बल्कि यूरोप के अनेक विकसित  ...

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समकालीन वैश्विक मीडिया: मीडिया का निगमीकरण

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सुभाष धूलिया समकालीन मीडिया के निगमीकरण , केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण की प्रक्रियाएं एक साथ चल रही हैं। मीडिया संघटन एक तो खुद  व्यापारिक निगम बन गए हैं और दूसरी और पूरी तरह विज्ञापन उद्योग पर निर्भर हैं । एक ओर तो नई प्रौद्योगिकी और इंटरनेट ने किसी भी व्यक्ति विशेष ...

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समकालीन वैश्विक मीडिया: सूचना का अंत और मनोरंजन आगमन

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सुभाष धूलिया तानाशाहियों की तुलना में मुक्त समाजों में  सेंसरशिप    असीमित रूप से कही अधिक परिष्कृत और गहन होती है क्योंकि  इस से असहमति को चुप कराया जा सकता है और प्रतिकूल तथ्यों को छिपाया जा सकता है- जोर्ज ऑरवेल आज की दुनिया औपचारिक रूप से अधिक लोकतान्त्रिक है लेकिन फिर ...

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समाचार, सिद्धांत और अवधारणा: स्रोत और पत्रकारिता

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सुभाष धूलिया पत्रकारिता और स्रोत के आपसी संबंधों से ही किसी भी समाज में पत्रकारिता का स्‍वरूप निर्धारित होता है। प्रेस की स्‍वतंत्रता का अर्थ ही यही है कि समाचारों के विविध और बहुत स्रोत उपलब्‍ध होते हैं और उनके द्वारा दी गई सूचना और जानकारी को प्रकाशित या प्रसारित ...

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समाचार: सिद्धांत और अवधारणा समाचार लेखन

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सुभाष धूलिया परंपरागत रूप से बताया जाता है कि समाचार उस समय ही पूर्ण कहा जा सकता है जब वह कौन, क्‍या, कब, कहां, क्‍यों, और कैसे सभी प्रश्‍नों या इनके उत्‍तर को लेकर लोगों की जिज्ञासा को संतुष्ट करता हो। हिंदी में इन्‍हें छह ककार के नाम से जाना ...

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ख़बरों का अद्भुत संसार, छवियां और यथार्थ

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सुभाष धूलिया। व्यवस्था के भीतर भी वस्तुपरक और संतुलित रिपोर्टिंग के लिए आवश्यक है कि सत्ता और पत्रकार के बीच एक ‘सम्मानजक दूरी’ बनाए रखी जाए। लेकिन आज जो रुझान सामने आ रहे हैं उसमें यह दूरी लगातार कम होती जा रही है और मीडिया पर सत्ता के प्रभाव में ...

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पत्रकारीय लेखन के प्रकार : तथ्य से विचार तक

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सुभाष धूलिया। तथ्य, विश्लेषण और विचार समाचार लेखन का सबसे पहला सिद्धांत और आदर्श यह है कि तथ्यों से कोई छेड़छाड़ न की जाए। एक पत्रकार का दृष्टिïकोण तथ्यों से निर्धारित हो। तथ्यात्मकता, सत्यात्मकता और वस्तुपरकता में अंतर है। तथ्य अगर पूरी सच्चाई उजागर नहीं करते तो वे सत्यनिष्ठï तथ्य ...

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पत्रकारिता के विविध आयाम

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सुभाष धूलिया | अपने रोजमर्रा के जीवन की एक नितांत सामान्य स्थिति की कल्पना कीजिए। दो लोग आसपास रहते हैं और लगभग रोज मिलते हैं। कभी बाजार में, कभी राह चलते और कभी एक-दूसरे के घर पर। उनकी भेंट के पहले कुछ मिनट की बातचीत पर ध्यान दीजिए। हर दिन ...

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